
आधी रात को अफ़ग़ानिस्तान के पूर्वी हिस्से में आए 6.0 तीव्रता के भूकंप ने हज़ारों ज़िंदगियों को झकझोर कर रख दिया।
Epicenter था जलालाबाद से करीब 27 किलोमीटर दूर, और गहराई सिर्फ 10 किलोमीटर – यानी ज़मीनी सतह के बेहद करीब।
इस shallow earthquake ने घरों को तो गिराया ही, लोगों की नींद और उम्मीद दोनों तोड़ दी।
अब तक 600 से अधिक मौतें और 1500 से ज्यादा घायल दर्ज किए गए हैं।
मिट्टी के घर, मिट्टी में मिल गए
अफ़ग़ानिस्तान के दूर-दराज़ इलाकों में लोग अभी भी परंपरागत मिट्टी और पत्थर से बने घरों में रहते हैं।
इनकी दीवारें भूकंप के झटकों को झेल नहीं पातीं। आधी रात को जब लोग सो रहे थे, उनका आशियाना उनके लिए कब्र बन गया।
कुनार प्रांत के तीन गाँव पूरी तरह तबाह हो चुके हैं। कई जगहों पर एक ही गांव में 30 से अधिक लोगों की मौत की पुष्टि हो चुकी है।
अस्पतालों की हालत: मरीज ज़्यादा, बेड कम
कुनार की राजधानी असदाबाद के मुख्य अस्पताल में हर 5 मिनट में एक घायल लाया जा रहा है। “अस्पताल में बिस्तर कम पड़ गए हैं, कई मरीजों को ज़मीन पर लिटाना पड़ रहा है।”
करीब 250 घायलों को नंगरहार प्रांत के बड़े अस्पतालों में शिफ्ट किया गया है।
राहत कार्य: हेलिकॉप्टर हैं, लेकिन रास्ते नहीं
भूकंप के बाद रेस्क्यू ऑपरेशन शुरू कर दिए गए हैं। हेलिकॉप्टर घायलों को निकाल रहे हैं, लेकिन भूस्खलन और खराब नेटवर्क के चलते कई इलाके पूरी तरह से कट गए हैं।
मोबाइल नेटवर्क लगभग ठप है, और सड़कें मलबे से बंद हैं। ऐसे में राहतकर्मियों को जमीन पर मदद पहुंचाने में भारी दिक्कत हो रही है।
तालिबान सरकार: “कोई विदेशी मदद नहीं मिली”
तालिबान के विदेश मंत्रालय ने बयान जारी कर कहा है:
“अब तक किसी भी विदेशी सरकार ने राहत और बचाव के लिए मदद की पेशकश नहीं की है।”
ये बयान अपने आप में बहुत कुछ कहता है – जब एक देश संकट में हो और कोई अंतरराष्ट्रीय हाथ न बढ़े, तो भूगोल से ज़्यादा राजनीति काँपती है।
क्यों बार-बार कांपता है अफ़ग़ानिस्तान?
अफ़ग़ानिस्तान का बड़ा हिस्सा हिंदुकुश पर्वत श्रृंखला में स्थित है, जहाँ Indian और Eurasian tectonic plates टकराती हैं।
यह इलाका सीस्मिक ज़ोन 4 में आता है – यानी बार-बार भूकंप आना लगभग तय है।
अंतरराष्ट्रीय मदद कहाँ है?
जहाँ तुर्किये या जापान जैसे देशों में भूकंप के 2 घंटे में अंतरराष्ट्रीय मदद पहुँच जाती है, वहीं अफ़ग़ानिस्तान के लिए कोई जल्दी नहीं दिखा रहा।
संभवत: इसका कारण तालिबान सरकार के साथ अंतरराष्ट्रीय संबंधों की जटिलता है। पर एक सवाल ज़रूर उठता है – जब जान बचानी हो, तो राजनीति बड़ी होनी चाहिए या इंसानियत?
धरती की नहीं, इंसानियत की भी परीक्षा
ये भूकंप सिर्फ एक प्राकृतिक आपदा नहीं, बल्कि अफ़ग़ानिस्तान की व्यवस्था, नेतृत्व और वैश्विक रिश्तों की भी एक litmus test है। जहाँ आम लोग रातों-रात बेघर हो गए, वहीं दुनियाभर की सरकारें चुप हैं। संवेदनशीलता की गहराई अब 10 किमी से कहीं नीचे जा चुकी है।
क्या किया जा सकता है?
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अंतरराष्ट्रीय NGO और राहत एजेंसियों को तत्काल एक्टिव होना चाहिए
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पड़ोसी देश पाकिस्तान को सहयोग बढ़ाना चाहिए
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मीडिया को ग्राउंड रिपोर्टिंग तेज़ करनी चाहिए
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दुनिया को यह याद दिलाना होगा कि अफ़ग़ानिस्तान सिर्फ एक जियोपॉलिटिकल केस स्टडी नहीं, इंसानों का देश भी है
इन चीज़ों का दान भूलकर भी न करें, नहीं तो पितृ भी कहेंगे ‘Unfollow’!

